रविवार, 12 अगस्त 2012

ज़िंदगी की इबारत

हँसता खिलखिलाता बचपन, मस्ती भरी जवानी.

                    सब ऐसे ही उड़ जाते हैं, समय के पंख लगाकर.

और अंत में शेष रह जाता है, एक अशक्त शरीर

                    एक सूखे पत्ते की तरह, जो इंतज़ार करता है ,

ड़ाल से टूट जाने का, अपने अस्तित्व को मिटाने का.        

बुधवार, 8 अगस्त 2012

इस बार की बारिश

इस बार की बारिश ने ऐसे ऐसे रंग दिखाए हैं की बड़े बड़े मौसम विशेषज्ञों के रंग उड़े हुए हैं . बरसाती मौसम की शुरुआत मे कहा गया की सामान्य बारिश होगी . इसकी तस्दीक करते हुए बदरा भी छाये और दो चार बूदें भी बर्षा गए . मेढक जमीन से निकलकर अपनी मधुर स्वरलहरी से वातावरण को गुंजायमान करने की प्लानिंग कर ही रहे थे की  सूरज ने फिर से आँख मिचोली खेलना शुरू कर दिया .  अनुमान लगाते लगाते आधा सावन बीत गया , लेकिन बादल बेरुखी पर कायम रहे . अब मौसम के कथित जानकारों ने कहना शुरू कर दिया की इस बार सूखा के आसार लग रहे हैं .  किसानो ने घबरा कर कई तरीके अपनाते हुए  भगवान को पटाने की कोशिश करना शुरू कर दीं . हालांकि भगवान शायद  कुछ और ही पटकथा लिखकर बैठे थे . जुलाई महीना ख़त्म होते न होते ऐसी झड़ी लगी की तालाब अपनी मर्यादा को भूलने लगे और नदियाँ पहले इठलाती और फिर रौद्र रूप धारण करती हुई लोगों के घरों की देहरी छूने लगीं . 

अब बारिश अपने पूरे शबाब पर है और मेरा मन पानी के जैसा ही इधर उधर बहते हुए अपने  किनारों की तलाश में लगा है.   



सोमवार, 23 जुलाई 2012

मेरे शब्द

मैं नहीं जानता कि मेरे लिखे को कौन पढता है , मैं  नहीं जानता कि मेरे  लेखन को कौन पसंद करता है या कि नापसंद । मैं बस ये जानता हूँ की मुझे अपने मन की हलचलों से उत्पन्न हुए विचारों को शब्द रूप देना है। मेरे शब्दों में न तो मिर्च की तरह तीखापन है न ही मिश्री की मिठास.  मेरे शब्द बस मेरे अपने हैं। आप इन्हें स्वीकार करते हैं तो धन्यवाद और तिरस्कार करते हैं तो साधुवाद। शब्दों की यात्रा अनवरत जारी रहती है।विचारों की शक्ति से जन्मे हुए शब्द ही क्रांति लाते हैं और नये युग का सूत्रपात करते हैं। ये शब्द ही तो हैं जिन्होंने मनुष्य को जानवर से इंसान बनाया। शब्दों ने सभ्यताओं को जन्म दिया है। लेकिन किसी एक सभ्यता की सत्ता को कायम भी नहीं रहने दिया। जब जब सभ्यताओं ने शब्दों के हथियार से कट्टरता को कायम करने की कोशिश की, तब तब दुसरे शब्दों ने धीरे से आकर इन सभ्यताओं को ही नेस्तनाबूद कर दिया।

इसलिए  मैं इन शब्दों के सहारे ही खुद से जुड़ने की कोशिश कर रहा हूँ, अपने अंतर्मन को जानने की ।  

 

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

राजेश खन्ना का जाना

कल और आज सारे मीडिया की सुर्खिया राजेश खन्ना के सम्बन्ध में ख़बरों से भरी पड़ी हैं। राजेश खन्ना बेशक 60 और आधे 70 दशक के हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार रहे हैं। मुझे उनकी जिस फिल्म ने सर्वाधिक प्रभावित किया वह है "आनंद ". इस फिल्म में आनंद का किरदार जिस तरीके से अपनी मौत को सामने देखते हुए  जिंदगी जीता है, उस तरीके से यदि आदमी अपनी जिंदगी जीने लगे तो जीवन का आनंद आ जायेगा। जब भी उनकी ये फिल्म टीवी पर आती है, में सब काम छोड़कर उसे देखने बैठ जाता हूँ।

राजेश खन्ना के सम्बन्ध में मीडिया की ख़बरों का समग्र रूप से आकलन करने ऐसा लग रहा है की वो अपनी सफलता के नशे से उबार नहीं पाए। मुझे लगता है की शराब के नशे से ज्यादा उनको सफलता के खुमार ने अपना शिकार ज्यादा बनाया।

राजेश खन्ना के प्रति श्रधान्जली .

naye blog me sabhi ka swagat hai

मित्रों ,
आज से में भी सारी दुनिया से सीधे जुड़ गया हूँ . इस अनोखी , प्यार भरी और विद्वत्तापूर्ण दुनिया में आप सभी का स्नेह और आशीर्वाद चाहता हूँ।