सोमवार, 28 जुलाई 2014

बरखा बहार आयी

रिमझिम बारिश हो रही है. सामने हरे घास का मैदान है, जहाँ पानी की बौछार पढ़ रही है. मन पानी की बूंदों जैसा तरल हुआ जा रहा है. वातावरण के साथ मन भी भीगा हुआ है. प्रक्रति नित नूतन वेश धारण करती हुई सम्मोहन की अवस्था में ले जाने के लिए तैयार है. कहते हैं की सौन्दर्य देखने के लिए आँखें चाहिए, फिर रेगिस्तान भी नखलिस्तान लगने लगता है. मेरी आँखें बारिश में सौन्दर्य देखती हैं. बारिश की बूंदें एक निश्चित लय के साथ जब जमीन पर ध्वनि के साथ गिरती हैं तो पुरे वातावरण को संगीतमय कर देती हैं. उस समय कुछ नहीं होता है. सब कुछ थम जाता है, केवल बारिश होती है और हम होते हैं.  

      

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे.........



गंगा केवल एक साधारण नदी नहीं है जो हिमालय से उतरकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है. हालांकि पहले मेरा भी मानना यही था कि गंगा अन्य नदियों की तरह ही है और हम पुरातन संस्कारों के वशीभूत होकर उसे देवी की तरह पूजते हैं. लेकिन हरिद्वार में गंगा के घाट पर शाम के समय गंगा नदी को देखते ही जो अदेखा था वह शीशे जैसा साफ़ हो गया. शीतल धारा कल कल करती हुई घाटों के साथ मेरे मन को भी साफ़ करती जा रही थी.  ऐसा मालूम हो रहा था मानो भारी जनसैलाब के बीच कोई गरिमामयी देवी ठनक के साथ अपना लहरियादार आंचल फहराते हुए आगे बढ़ रही हो. एक नदी से एक जीवंत महाप्राण में परिवर्तित होते हुए. उसके आसपास सभी को सम्मोहित तथा भावाविष्ट अवस्था में छोड़ते हुए. जहां सभी के मन गा उठते हैं: गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे.........