शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे.........



गंगा केवल एक साधारण नदी नहीं है जो हिमालय से उतरकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है. हालांकि पहले मेरा भी मानना यही था कि गंगा अन्य नदियों की तरह ही है और हम पुरातन संस्कारों के वशीभूत होकर उसे देवी की तरह पूजते हैं. लेकिन हरिद्वार में गंगा के घाट पर शाम के समय गंगा नदी को देखते ही जो अदेखा था वह शीशे जैसा साफ़ हो गया. शीतल धारा कल कल करती हुई घाटों के साथ मेरे मन को भी साफ़ करती जा रही थी.  ऐसा मालूम हो रहा था मानो भारी जनसैलाब के बीच कोई गरिमामयी देवी ठनक के साथ अपना लहरियादार आंचल फहराते हुए आगे बढ़ रही हो. एक नदी से एक जीवंत महाप्राण में परिवर्तित होते हुए. उसके आसपास सभी को सम्मोहित तथा भावाविष्ट अवस्था में छोड़ते हुए. जहां सभी के मन गा उठते हैं: गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे.........

    
      

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