सोमवार, 28 जुलाई 2014

बरखा बहार आयी

रिमझिम बारिश हो रही है. सामने हरे घास का मैदान है, जहाँ पानी की बौछार पढ़ रही है. मन पानी की बूंदों जैसा तरल हुआ जा रहा है. वातावरण के साथ मन भी भीगा हुआ है. प्रक्रति नित नूतन वेश धारण करती हुई सम्मोहन की अवस्था में ले जाने के लिए तैयार है. कहते हैं की सौन्दर्य देखने के लिए आँखें चाहिए, फिर रेगिस्तान भी नखलिस्तान लगने लगता है. मेरी आँखें बारिश में सौन्दर्य देखती हैं. बारिश की बूंदें एक निश्चित लय के साथ जब जमीन पर ध्वनि के साथ गिरती हैं तो पुरे वातावरण को संगीतमय कर देती हैं. उस समय कुछ नहीं होता है. सब कुछ थम जाता है, केवल बारिश होती है और हम होते हैं.  

      

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