गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

बच्चों से प्यार, ईश्वर से साक्षात्कार

एक बच्चे की मुस्कान इस दुनिया की सबसे खुबसूरत और सुकून देने वाली चीज है. जैसे ही एक नन्हा बच्चा खिलखिलाता है, आसपास की हर चीज खिल उठती है. सोचिये उस पल को जब कभी आप बेहद गुस्से में थे और अचानक कोई बच्चा मुस्कुराते हुए आपकी ओर ताकने लगता है, ऐसा लगता है जैसे गर्मी से तपती हुई धरती पर बारिश के छींटे पढ़ गए हों. आप सब कुछ भूलकर उस बच्चे की मुस्कान की फुहार में भीगने लगते हैं. 

ईश्वर की झलक पाना चाहते है, बच्चों के पास बने रहिए. उनकी मासूम मुस्कान में खो जाइए, उनके साथ खिलखिलाइए, उनकी विस्मय विमुग्ध आँखों में ध्यानस्थ हो जाइये. सूरदास कान्हा की बाल लीलाओं में डूबते-उतराते प्रेम के उच्चतम शिखर को छू लेते हैं. ऐसे लगता है जैसे वे वृन्दावन में जशोदा के आंगन के एक कौने में बैठे कन्हैया को निरख रहे हैं. एक बानगी देखिये:

हरस आनंद बढ़ावत
हरि अपनैं आंगन कछु गावत।
तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत॥
माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत।
कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत॥
दुरि देखति जसुमति यह लीला हरस आनंद बढ़ावत।
सूर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत॥



बच्चे जो कुछ भी करते है, पूरी सम्पूर्णता के साथ. और जो सम्पूर्ण है, वही तो ईश्वर है न.







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