प्रश्न : गुरुदेव , बहुत से ज्ञान की पुस्तको में मैंने पढ़ा है
, सब कुछ सिर्फ एक ही चेतना है , और हम सब उसका ही एक हिस्सा हैं | अगर ऐसा है तो समर्पण का क्या अर्थ है ? ऐसा क्या है जो हमें समर्पित कर रहे है और किसको समर्पित कर रहे हैं , जबकि सब एक ही चेतना है |
श्री श्री रविशंकर : हाँ , बिलकुल सही | दरअसल समर्पण को कुछ है ही नहीं , लेकिन जब मन को लगता है कि मैं अलग हूँ , भिन्न हूँ , अकेला हूँ ,
तब इस बात से हटने को आप समर्पण करें और विश्राम में आ जायें | ये माँ के घर पर होने के अहसास को जगाने जैसा है
| उस अहसास को जगाने और छोड़ देने के कृत्य को ही समर्पण कहा गया है , बस | ऐसा कुछ है ही नहीं जिसे आपने समर्पण करना है , समझ गए ?
इसीलिए तीन तरह के पथ हैं - कर्म योग अर्थात कार्य का पथ , भक्ति योग अर्थात भक्ति का पथ , ज्ञान योग अर्थात ज्ञान का पथ | ज्ञान का पथ ये है कि आप जागृत होकर ये समझें कि सब कुछ एक से ही बना है , दो तो कुछ है ही नहीं | लेकिन जब आप ये भूल जाते हैं और समझने लगते हैं कि दो हैं , जब कुछ ऐसा होता है कि जहाँ आप अटक जाते हैं , आपके मन में बहुत बोझ सा आ जाता है और आप उसको बर्दाश्त नहीं कर पाते , तब आप कहते हैं ," मैं इसको छोड़ता हूँ " , ये समर्पण है | इसका बहुत अच्छा उदाहरण है , "आप रेलगाड़ी में बैठे हों और अपना सामान कंधो पर उठाये हुए हों , हालाँकि सीट बहुत आरामदायक है लेकिन आपके कंधे और सर पर सामान का बोझ होने से आप बहुत असुविधा महूस कर रहे हों | तभी कोई आकर आपसे कहे कि अरे , सामान नीचे रख दो , ऐसे भी तुम्हारा और तुम्हारे सामान का बोझ तो गाड़ी ने ही उठाया हुआ है , आराम से बैठो | आपको वो पूर्ण आराम की अनुभूति कराने को ही शरणागति कहते हैं |
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