हम जो भी प्रार्थना करते हैं , वह
अपनी खुशी के लिए करते हैं | अपने उत्थान के लिए करते हैं | भगवान
की खुशामदी करने के लिए नहीं | इसीलिये , जो लोग
भगवान को खुश करने के लिए उपवास रखते हैं , वे सब
मूर्ख लोग हैं |
यदि आप ये सोचकर भगवान की प्रार्थना करते हैं , कि वे
आपको विशेष रूप से कोई फल दे देगा – ये नहीं , लेकिन
हाँ , अगर आप प्रार्थना करेंगे , तो
आपको प्रार्थना का फल मिलगा ही – ये तो नियम है | आप
खिड़की खोलेंगे , तो सूरज तो घर के अंदर आएगा ही | और जबी
सूरज घर के अंदर आएगा , तो उसका लाभ तो आपको होगा ही |
भगवान को तो हम अच्छे लगते ही हैं , मगर
हमें भी भगवान अच्छे लगने लगें , इसी को भक्ति कहते हैं | पूजा
का अर्थ ही है , कि जिसे ‘पूर्णता’ से
किया जाए | मन इतना भर आया , कि
आभार व्यक्ति करने के लिए हमने जो किया , वही
पूजा है | जब हम इतने खुश हैं , इतने
तृप्त हैं कि हम कहें , ‘भगवान
मैं इतना आभारी हूँ | आपने हमको इतना दिया!’ जब भाव
उमड़ता है , तो उसके साथ कुछ क्रिया जुड़ ही जाती है |
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बुधवार, 10 अप्रैल 2013
Gurudev Sri Sri Ravishankarji ke Prerak vachan
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