हँसता खिलखिलाता बचपन, मस्ती भरी जवानी.
सब ऐसे ही उड़ जाते हैं, समय के पंख लगाकर.
और अंत में शेष रह जाता है, एक अशक्त शरीर
एक सूखे पत्ते की तरह, जो इंतज़ार करता है ,
ड़ाल से टूट जाने का, अपने अस्तित्व को मिटाने का.
सब ऐसे ही उड़ जाते हैं, समय के पंख लगाकर.
और अंत में शेष रह जाता है, एक अशक्त शरीर
एक सूखे पत्ते की तरह, जो इंतज़ार करता है ,
ड़ाल से टूट जाने का, अपने अस्तित्व को मिटाने का.
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