इस बार की बारिश ने ऐसे ऐसे रंग दिखाए हैं की बड़े बड़े मौसम विशेषज्ञों के रंग उड़े हुए हैं . बरसाती मौसम की शुरुआत मे कहा गया की सामान्य बारिश होगी . इसकी तस्दीक करते हुए बदरा भी छाये और दो चार बूदें भी बर्षा गए . मेढक जमीन से निकलकर अपनी मधुर स्वरलहरी से वातावरण को गुंजायमान करने की प्लानिंग कर ही रहे थे की सूरज ने फिर से आँख मिचोली खेलना शुरू कर दिया . अनुमान लगाते लगाते आधा सावन बीत गया , लेकिन बादल बेरुखी पर कायम रहे . अब मौसम के कथित जानकारों ने कहना शुरू कर दिया की इस बार सूखा के आसार लग रहे हैं . किसानो ने घबरा कर कई तरीके अपनाते हुए भगवान को पटाने की कोशिश करना शुरू कर दीं . हालांकि भगवान शायद कुछ और ही पटकथा लिखकर बैठे थे . जुलाई महीना ख़त्म होते न होते ऐसी झड़ी लगी की तालाब अपनी मर्यादा को भूलने लगे और नदियाँ पहले इठलाती और फिर रौद्र रूप धारण करती हुई लोगों के घरों की देहरी छूने लगीं .
अब बारिश अपने पूरे शबाब पर है और मेरा मन पानी के जैसा ही इधर उधर बहते हुए अपने किनारों की तलाश में लगा है.

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