मैं नहीं जानता कि मेरे लिखे को कौन पढता है , मैं नहीं जानता कि मेरे लेखन को कौन पसंद करता है या कि नापसंद । मैं बस ये जानता हूँ की मुझे अपने मन की हलचलों से उत्पन्न हुए विचारों को शब्द रूप देना है। मेरे शब्दों में न तो मिर्च की तरह तीखापन है न ही मिश्री की मिठास. मेरे शब्द बस मेरे अपने हैं। आप इन्हें स्वीकार करते हैं तो धन्यवाद और तिरस्कार करते हैं तो साधुवाद। शब्दों की यात्रा अनवरत जारी रहती है।विचारों की शक्ति से जन्मे हुए शब्द ही क्रांति लाते हैं और नये युग का सूत्रपात करते हैं। ये शब्द ही तो हैं जिन्होंने मनुष्य को जानवर से इंसान बनाया। शब्दों ने सभ्यताओं को जन्म दिया है। लेकिन किसी एक सभ्यता की सत्ता को कायम भी नहीं रहने दिया। जब जब सभ्यताओं ने शब्दों के हथियार से कट्टरता को कायम करने की कोशिश की, तब तब दुसरे शब्दों ने धीरे से आकर इन सभ्यताओं को ही नेस्तनाबूद कर दिया।
इसलिए मैं इन शब्दों के सहारे ही खुद से जुड़ने की कोशिश कर रहा हूँ, अपने अंतर्मन को जानने की ।

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