शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

पूर्णिमा का चाँद

धुंधलाती शाम को गाड़िओं का शोर,
धुँआ ही धुँआ चारों ओर.
एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में,
सब भाग रहे हैं अंजानी दौड़ में.
सबको घर पहुचने की जल्दी ,
गाड़ियां सड़कों पर फिसलती।

और ऊपर, चाँद चमक रहा है, चांदी के थाल जैसा
सब पर चांदनी छिड़कते हुए, अपनी ही धुन में
स्निग्ध ज्योत्स्ना का सागर, असीम सौंदर्य की गागर।

नीचे ओव्हर ब्रिज पर रेंगती हुई गाड़ियाँ
भरी हुई बसों में उकताई हुई जिंदगियाँ। 
कान फोड़ते हॉर्न की सताई हुई जिंदगियाँ,

और उपर चाँद की मद भरी अठखेलियाँ 
काले बादलों से झाँकता, बूझता सा पहेलियाँ

कभी एक दिन बस यूँ ही, मेरी नजर नीचे से ऊपर को चली गयी,
और उसी वक्त कुछ नया हो हो गया, भीढ़ भरी सडक पर भी मन चाँद में खो गया.













गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

बच्चों से प्यार, ईश्वर से साक्षात्कार

एक बच्चे की मुस्कान इस दुनिया की सबसे खुबसूरत और सुकून देने वाली चीज है. जैसे ही एक नन्हा बच्चा खिलखिलाता है, आसपास की हर चीज खिल उठती है. सोचिये उस पल को जब कभी आप बेहद गुस्से में थे और अचानक कोई बच्चा मुस्कुराते हुए आपकी ओर ताकने लगता है, ऐसा लगता है जैसे गर्मी से तपती हुई धरती पर बारिश के छींटे पढ़ गए हों. आप सब कुछ भूलकर उस बच्चे की मुस्कान की फुहार में भीगने लगते हैं. 

ईश्वर की झलक पाना चाहते है, बच्चों के पास बने रहिए. उनकी मासूम मुस्कान में खो जाइए, उनके साथ खिलखिलाइए, उनकी विस्मय विमुग्ध आँखों में ध्यानस्थ हो जाइये. सूरदास कान्हा की बाल लीलाओं में डूबते-उतराते प्रेम के उच्चतम शिखर को छू लेते हैं. ऐसे लगता है जैसे वे वृन्दावन में जशोदा के आंगन के एक कौने में बैठे कन्हैया को निरख रहे हैं. एक बानगी देखिये:

हरस आनंद बढ़ावत
हरि अपनैं आंगन कछु गावत।
तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत॥
माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत।
कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत॥
दुरि देखति जसुमति यह लीला हरस आनंद बढ़ावत।
सूर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत॥



बच्चे जो कुछ भी करते है, पूरी सम्पूर्णता के साथ. और जो सम्पूर्ण है, वही तो ईश्वर है न.







सोमवार, 28 जुलाई 2014

बरखा बहार आयी

रिमझिम बारिश हो रही है. सामने हरे घास का मैदान है, जहाँ पानी की बौछार पढ़ रही है. मन पानी की बूंदों जैसा तरल हुआ जा रहा है. वातावरण के साथ मन भी भीगा हुआ है. प्रक्रति नित नूतन वेश धारण करती हुई सम्मोहन की अवस्था में ले जाने के लिए तैयार है. कहते हैं की सौन्दर्य देखने के लिए आँखें चाहिए, फिर रेगिस्तान भी नखलिस्तान लगने लगता है. मेरी आँखें बारिश में सौन्दर्य देखती हैं. बारिश की बूंदें एक निश्चित लय के साथ जब जमीन पर ध्वनि के साथ गिरती हैं तो पुरे वातावरण को संगीतमय कर देती हैं. उस समय कुछ नहीं होता है. सब कुछ थम जाता है, केवल बारिश होती है और हम होते हैं.  

      

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे.........



गंगा केवल एक साधारण नदी नहीं है जो हिमालय से उतरकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है. हालांकि पहले मेरा भी मानना यही था कि गंगा अन्य नदियों की तरह ही है और हम पुरातन संस्कारों के वशीभूत होकर उसे देवी की तरह पूजते हैं. लेकिन हरिद्वार में गंगा के घाट पर शाम के समय गंगा नदी को देखते ही जो अदेखा था वह शीशे जैसा साफ़ हो गया. शीतल धारा कल कल करती हुई घाटों के साथ मेरे मन को भी साफ़ करती जा रही थी.  ऐसा मालूम हो रहा था मानो भारी जनसैलाब के बीच कोई गरिमामयी देवी ठनक के साथ अपना लहरियादार आंचल फहराते हुए आगे बढ़ रही हो. एक नदी से एक जीवंत महाप्राण में परिवर्तित होते हुए. उसके आसपास सभी को सम्मोहित तथा भावाविष्ट अवस्था में छोड़ते हुए. जहां सभी के मन गा उठते हैं: गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे.........

    
      

बुधवार, 25 जून 2014

मन रे तू काहे न धीर धरे

अपने अंतर्मन को जानने-पहचानने के लिए कभी कभी जाने अनजाने ही कई बिम्ब-प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ने लगते हैं. मन रे तू काहे न धीर धरे .कुछ याद आया. बहुत पुरानी फिल्म चित्रलेखा का यह गाना भी बहुत पुराना है , लेकिन इसमें कहा गया एक एक शब्द ह्रदय के अन्दर उतरता जाता है और इसके साथ ही उतरती जाती है गहन शांति, धीरे धीरे ............






गुरुवार, 19 जून 2014

बारिश का इन्तजार


     सभी बेसब्री से रिमझिम फुहारों का इन्तजार कर रहे हैं. पपीहा विरही होकर पेड़ की डाल से मेघों को पुकार दे रहा है. मेघों, अपने प्रेमी की आवाज सुनकर आओ और उसके गले से उतरकर उसकी देह में समा जाओ. पतझड़ में अपना सब कुछ गवांकर अनचाही विरक्ति से मुक्ति पाने के लिए पेड़ पुकार दे रहे है. बारिश की बूंदों आओ और इनका पुनः हरीतिमा से श्रृगार कर जाओ. गर्मी और सूरज से निकलते शोलों से बंजर हो चुकी जमीन बरसात का इन्तजार करते हुए क्रोधित होकर सब कुछ धूल धूसरित करने पर आमादा है. इस सूखी बंजर धरती को अपने तेज प्रवाह से धो पोंछकर इसे हरी चूनर उड़ा जाओ. किसान आसमान में टकटकी लगाकर तुम्हारी राह देख रहे हैं. तुम आओ और उसके खेतों को पानी से सारोबार कर जाओ. इन सभी के साथ हम भी बेसब्री से तुम्हारी राह देख रहे हैं. मानसून आने के लिए आज आधे से ज्यादा महीना बीत चुका है. बादल आते हैं और अपना श्याम वर्ण का सलोना चेहरा दिखाकर चले जाते हैं. बारिश की आमद की दूर दूर तक खबर नहीं है. बारिश तुम कब आओगी ?



     

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

समर्पण : गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

 
प्रश्न : गुरुदेव , बहुत से ज्ञान की पुस्तको में मैंने पढ़ा है , सब कुछ सिर्फ एक ही चेतना है , और हम सब उसका ही एक हिस्सा हैं | अगर ऐसा है तो समर्पण का क्या अर्थ है ? ऐसा क्या है जो हमें समर्पित कर रहे है और किसको समर्पित कर रहे हैं , जबकि सब एक ही चेतना है |

श्री श्री रविशंकर : हाँ , बिलकुल सही | दरअसल समर्पण को कुछ है ही नहीं , लेकिन जब मन को लगता है कि मैं अलग हूँ , भिन्न हूँ , अकेला हूँ , तब इस बात से हटने को आप समर्पण करें और विश्राम में जायें | ये माँ के घर पर होने के अहसास को जगाने जैसा है | उस अहसास को जगाने और छोड़ देने के कृत्य को ही समर्पण कहा गया है , बस | ऐसा कुछ है ही नहीं जिसे आपने समर्पण करना है , समझ गए ?

इसीलिए तीन तरह के पथ हैं - कर्म योग अर्थात कार्य का पथ , भक्ति योग अर्थात भक्ति का पथ , ज्ञान योग अर्थात ज्ञान का पथ | ज्ञान का पथ ये है कि आप जागृत होकर ये समझें कि सब कुछ एक से ही बना है , दो तो कुछ है ही नहीं | लेकिन जब आप ये भूल जाते हैं और समझने लगते हैं कि दो हैं , जब कुछ ऐसा होता है कि जहाँ आप अटक जाते हैं , आपके मन में बहुत बोझ सा जाता है और आप उसको बर्दाश्त नहीं कर पाते , तब आप कहते हैं ," मैं इसको छोड़ता हूँ " , ये समर्पण है | इसका बहुत अच्छा उदाहरण है , "आप रेलगाड़ी में बैठे हों और अपना सामान कंधो पर उठाये हुए हों , हालाँकि सीट बहुत आरामदायक है लेकिन आपके कंधे और सर पर सामान का बोझ होने से आप बहुत असुविधा महूस कर रहे हों | तभी कोई आकर आपसे कहे कि अरे , सामान नीचे रख दो , ऐसे भी तुम्हारा और तुम्हारे सामान का बोझ तो गाड़ी ने ही उठाया हुआ है , आराम से बैठो | आपको वो पूर्ण आराम की अनुभूति कराने को ही शरणागति कहते हैं |
 
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