धुंधलाती शाम को गाड़िओं का शोर,
धुँआ ही धुँआ चारों ओर.
एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में,
सब भाग रहे हैं अंजानी दौड़
में.
सबको घर पहुचने की जल्दी ,
गाड़ियां सड़कों पर फिसलती।
और ऊपर, चाँद चमक रहा है, चांदी के थाल जैसा
सब पर चांदनी छिड़कते हुए, अपनी ही धुन में
स्निग्ध ज्योत्स्ना का सागर, असीम सौंदर्य की गागर।
नीचे ओव्हर ब्रिज पर रेंगती
हुई गाड़ियाँ,
भरी हुई बसों में उकताई हुई
जिंदगियाँ।
कान फोड़ते हॉर्न की सताई
हुई जिंदगियाँ,
और उपर चाँद की मद भरी अठखेलियाँ
काले बादलों से झाँकता, बूझता सा पहेलियाँ
कभी एक दिन बस यूँ ही, मेरी नजर नीचे से ऊपर को चली गयी,
और उसी वक्त कुछ नया हो हो गया, भीढ़ भरी सडक पर भी मन चाँद में खो गया.

